नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने डिजिटल लेन देन को बढ़ावा देने के अनेक उपाय किए हैं लेकिन ऐसा लग रहा है कि आम लोगों के जीवन में डिजिटल लेन देन शामिल करा कर सरकार सुरक्षा के उपाय करने में विफल रही है। सरकार ने खुद बताया है कि इस साल अभी तक डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के 22 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं और अभी तक आठ सौ करोड़ रुपए की ठगी हुई है। पिछले साल 58 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए थे और आम लोगों से 1,211 करोड़ रुपए की ठगी हुई थी।
डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जिसके दौरान ये आंकड़े रखे गए। अदालत ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई और सवालिया लहजे में कहा कि जागरूकता अभियान और लगातार खबरें आने के बावजूद शिक्षित लोग भी इन घोटालों का शिकार कैसे हो रहे हैं? अदालत ने कहा कि घटना के बाद सिर्फ रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है।
इतना ही नहीं चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘अगर बैंक की लापरवाही के कारण साइबर ठगी होती है तो बैंक पीड़ित को मुआवजा दें और जिम्मेदारी तय होने पर कार्रवाई का सामना करें’। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ‘यह अभी प्रस्ताव है, अंतिम आदेश नहीं’। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि केवल घटना के बाद रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है, ठगी को रोकने के लिए पहले से इंतजाम जरूरी हैं।
अदालत ने पूछा कि खाते में असामान्य लेन देन होने पर बैंक उसे वेरिफाई तक अस्थायी रूप से क्यों नहीं रोक सकते? इसके बाद अदालत ने कहा कि संदिग्ध ट्रांजैक्शन की जांच और उसकी जानकारी स्थानीय पुलिस को दी जाए। अदालत ने रिजर्व बैंक से अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची मांगी और कहा कि आरबीआई के प्रस्तावित नियमों में उन मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान होना चाहिए, जहां वित्तीय संस्थान जरूरी सावधानी बरतने में विफल रहे हों। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई से प्रस्तावित केवाईसी संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा करने और सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने को कहा। अदालत की मदद के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी और सीनियर एडवोकेट एनएस नप्पिनई ने कहा कि गिरफ्तारी के डर से लोग मानसिक दबाव में आकर ठगों के निर्देश मान लेते हैं और अपनी जमापूंजी गंवा बैठते हैं।